Tuesday, 23 August 2016

दिल में खंज़र न चुभाना की तेरा नाम भी है

हो रही सुबहा कहीं पर तो कहीं शाम भी है
इतनी थोड़ी सी पिलायेगा या इंतेज़ाम भी है

अपनी यादो से कहो और न सताए हमें
काम करने दो हमें और बहुत काम भी है

ज़ख्म दे दो जो कही पे तो शिकायत न करुं
दिल में खंज़र न चुभाना की तेरा नाम भी है

अब तो बातें न बना और हमें इतना बता
सिर्फ साकी है यहाँ पर या कोई ज़ाम भी है

वक़्त बेवक़्त मुझे यूँ ही बुलाया न करो
सारथी के तो बहुत से यहाँ निज़ाम भी है 

4 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 25 अगस्त 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. bahut badhiya bhaw....wartani par dhyan de

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