Tuesday, 23 August 2016

दिल में खंज़र न चुभाना की तेरा नाम भी है

हो रही सुबहा कहीं पर तो कहीं शाम भी है
इतनी थोड़ी सी पिलायेगा या इंतेज़ाम भी है

अपनी यादो से कहो और न सताए हमें
काम करने दो हमें और बहुत काम भी है

ज़ख्म दे दो जो कही पे तो शिकायत न करुं
दिल में खंज़र न चुभाना की तेरा नाम भी है

अब तो बातें न बना और हमें इतना बता
सिर्फ साकी है यहाँ पर या कोई ज़ाम भी है

वक़्त बेवक़्त मुझे यूँ ही बुलाया न करो
सारथी के तो बहुत से यहाँ निज़ाम भी है 

Sunday, 20 March 2016

चाँदनी रातें भी अब तो हमें जलाती है

शाम इतना भी अब हमें नही लुभाती है 
याद उनकी न जाये तो ये मुस्कराती है 

उनको भूलें भी तो कैसे समझ नही पाता 
वो राहें साथ चले जिनपे वो बुलाती है 

कितनी रातों से न सोये है ये भी याद नही 
उनकी यादें तो अब फ़क़त हमें रुलाती है 

दिन के तपते हुए सूरज की बात कौन करे 
चाँदनी रातें भी अब तो हमें जलाती है  

अर्ज़ इतनी सी थी रहना हमेशा साथ मेरे 
'सारथी' को वो ज़िंदगी से क्यों मिटाती है 

Wednesday, 30 September 2015

इश्क़ में ए- मेरे- मौला हिसाब सा क्यों है

अब तो रुखसार पे उनके नक़ाब सा क्यों है
इश्क़ में ए- मेरे- मौला हिसाब सा क्यों है

वो जो बस बेवफ़ा की ज़ात से थे
ज़िन्दगी उनके बिन लगे ख़राब सा क्यों है

जिनको चाहे तमाम उम्र कटी
अब वो यादों से भी जायेंगे ख़्वाब सा क्यों है

उसने गलती नहीं गुनाह किया
फिर भी आँखों में जो देखा जबाब सा क्यों है

इश्क़ की खोखली निधि जो हुये
'सारथी' चेहरे पे उनके रुआब सा क्यों है 




'सारथी' को हमेशा लुभाते रहे

वो हमें देख कर मुस्कराते रहे
अपनी पलकें गिराकर उठाते रहे

प्यार उनको भी है ये यकीं है हमें
वो छुपाते रहे, हम जताते रहे

उनकी आँखे जो गहरा समंदर लगे
वो चुराते रहे, फिर मिलते रहे

हुश्न की शोख़िया भी गज़ब देखिये
हम जो लिखते रहे वो मिटाते रहे

जिनको देखे बिना चैन आये नहीं
'सारथी' को हमेशा लुभाते रहे  

नयन कैसे हो गए मेरे सज़ल हमने लिखा

उनकी यादो में सारे ग़ज़ल हमने लिखा
लब की उदासी, दिल विकल हमने लिखा 

जब भी कोई पूछता क्या इश्क़ तुमने भी किया 
नयन कैसे हो गए मेरे सज़ल हमने लिखा 

जिनकी खातिर ज़िन्दगी में हर खुशी क़ुर्बान की 
बेवफाई की वो कैसे की पहल हमने लिखा 

न तो लफ़्फ़ाज़ी लिखी न शौक से हमने लिखा 
जो थे बीते ज़िन्दगी में आजकल हमने लिखा 

एक उम्र तक बाँहों को मेरे जो समझता था निधि 
'सारथी' को छोड़ भाये अब महल हमने लिखा

Tuesday, 11 August 2015

रूख हवा का देखकर अक़सर बदल जाते है लोग

रूख हवा का देखकर अक़सर बदल जाते है लोग
कलतलक मिलते थे दिल से आज कतराते है लोग

अपनों से मिलती खुशी ये लोग कहते है सभी
अपनों से कटरा के फिर क्यों ग़ैर अपनाते है लोग

जिंदगी की राह जो है काटों से मिलकर बनी
काटों पर चलने से फिर क्यों इतना घबराते है लोग

बेवफाई खुद मई हो और दूजे पे इलज़ाम दे
खुद की भी अग्नि-परीक्षा क्यों न करवाते है लोग

 हो ग़ैर की तो आपको फिर क्यों मिले
'सारथी' इतना सा फिर क्यों न समझ पते है लोग  

Monday, 3 August 2015

'सारथी' आज तेरे नाम से बदनाम हो जाये

इश्क़ जब पर करे हद तो वो नाकाम हो जाये
जो न गुज़रे हदों को तो क्यों ये गुमनाम हो जाये

इश्क़ मिलता नही किसी को हकीकत ऐसी
सच्चा आशिक़ तो मिले पाने को नीलाम हो जाये

जिनकी यादों में कही पर भी दिल नही लगता
उनकी यादों में आज फिर से एक जाम हो जाये

वफ़ा की राह में ठोकर के सिवा कुछ भी नही 
इसमें जो भटके वो हर काम से बेकाम हो जाये

अबतलक तुमको छुपाया था निधि माने हुये
'सारथी' आज तेरे नाम से बदनाम हो जाये